
तसल्ली सी हो गयी.,,,, पहचानती तो है...!
तेरे जिस्म में छोङ आये....
गले मिलना... तो एक बहाना था....
कोई अपना आया है मिलने मुझसे मुद्दतों के बाद..!!
जो जज़्बात थे सिर्फ तुम्हारे लिए,
उन्हें अब ज़माना पढ़ रहा है...!!!
नज़रे भी मुझ पर गड़ाये बैठे हैं और कहते है जी लेंगे हम तेरे बिन ..
अफसोस वही लोग मेरे दिल के कातिल निकले........
पर उस मां को कैसे भूल जाऊ जिसने प्यार करना सिखाया है.
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ताकि तुम ख्वाबों में नहीं मेरी रूह में आ सको......
ज़िंदा है इसमें कोई..लेकिन ये मर चुका है..!
समझता दिल भी नही, वो भी नही, मै भी नही।।..
हम सादगी लेकर कहाँ जायें?
ताल्लुकात कम कर देने से कम नहीं होती...!!!
जरुरी तो नही सिकन्दर की तरह तलवार रखी जाये.
तेरे जिस्म में छोङ आये....
गले मिलना... तो एक बहाना था....
देख कर जाने क्यों लगा कि तुम वो ना रहे जो पहले थी...
काश..मेरे दिल को पढ़ पाते तुम..!
आइए साथ चलें इश्क़ के सफ़र पर !!
इबादत के लिए ख़ुदा भी तो ज़रूरी होता है
अगर अहसास है तो महसूस कर तकलीफ मेरी..!!
हो के अपना कोई खो जाये इससे बड़ी सजा भी क्या है..!!!
उन्हें पाने की ख्वाइश तो उसे दिल से तो खत्म कर दे..!!
ऐब न हों तो लोग महफ़िलों में नहीं बिठाते...!!
बता..!!!
आँखे निकाल दूँ,,,? या सीने से दिल...?
दुनिया ने ढंग से इश्क भी करने ना दिया.
हम सादगी लेकर कहाँ जायें?
कुछ इल्ज़ाम थे शाम के..
लड़को का दिल तोड़ सकती है..मगर अपना वादा नहीं !!
अब कोई फरिश्ता भी आ जाये तो भी मोहब्बत ना करू
क्या होंगी,
जिसकी 'साँसे' भी 'गुबारों' में
बिकती है...।
बस इश्क़ होता है..
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